श्री कालभैरवाष्टकम (Shri Kalabhairavashtakam): समय के स्वामी और काशी के रक्षक की दिव्य स्तुति
भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों में ‘काल भैरव’ का स्वरूप अत्यंत विशिष्ट है। उन्हें ‘काल’ (समय) का भी काल माना जाता है। काशी नगरी की रक्षा का भार स्वयं महादेव ने इन्हें सौंपा है, इसलिए इन्हें ‘काशी का कोतवाल’ भी कहा जाता है। आदि गुरु शंकराचार्य ने भगवान काल भैरव की प्रसन्नता और शत्रुओं के नाश के लिए “Shri Kalabhairavashtakam” की रचना की थी।
आज theshivling.com की “108 शिव स्तोत्र श्रृंखला” के नौवें अध्याय में, हम Shri Kalabhairavashtakam के सभी ८ श्लोकों, उनके गहरे आध्यात्मिक अर्थ और काल भैरव की साधना से मिलने वाले लाभों के बारे में विस्तार से जानेंगे।

काल भैरव और कालभैरवाष्टकम का महत्व (Significance)
काल भैरव का अर्थ है—वह जो ‘भय’ का नाश करे। भैरव शब्द तीन अक्षरों से बना है: ‘भ’ (भरण), ‘र’ (रमण) और ‘व’ (वमन)। यह सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार के प्रतीक हैं। Shri Kalabhairavashtakam का पाठ करने से न केवल समय का सदुपयोग करने की प्रेरणा मिलती है, बल्कि यह मानसिक विकारों, जैसे क्रोध, लोभ और अहंकार को भी शांत करता है।
॥ श्री कालभैरवाष्टकम (Shri Kalabhairavashtakam) – संपूर्ण पाठ और हिंदी अर्थ ॥
॥ श्री कालभैरवाष्टकम (Shri Kalabhairavashtakam) – संपूर्ण ८ श्लोक अर्थ सहित ॥
१. देवराज इंद्र द्वारा पूजित चरणकमल: देवराजसेव्यमानपावनाङ्घ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम् । नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगम्बरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ १ ॥ अर्थ: जिनके पावन चरणकमलों की सेवा स्वयं देवराज इंद्र करते हैं, जिन्होंने साँपों का यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण किया है, जिनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है और जो परम कृपालु हैं; जिन्हें नारद और महान योगियों का समूह प्रणाम करता है और जो दिगंबर (आकाश को ही वस्त्र मानने वाले) हैं—उन काशी नगरी के स्वामी काल भैरव की मैं वंदना करता हूँ।
२. करोड़ों सूर्यों का तेज: भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम् । कालकालमम्बुजाक्षमक्षशूलमक्षरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ २ ॥ अर्थ: जो करोड़ों सूर्यों के समान दीप्तिमान (चमकदार) हैं, जो संसार रूपी सागर से पार उतारने वाले हैं, जिनका कंठ नीला है, जो भक्तों की हर इच्छा पूरी करते हैं और जिनके तीन नेत्र हैं; जो काल के भी महाकाल हैं, जिनकी आँखें कमल के समान सुंदर हैं और जो अविनाशी हैं—उन काशी के अधिपति काल भैरव को मैं भजता हूँ।
३. अजेय अस्त्र और अद्भुत तांडव: शूलटङ्कपाशदण्डपाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् । भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ३ ॥ अर्थ: जो अपने हाथों में शूल, टंक, पाश और दंड धारण किए हुए हैं, जो सृष्टि के आदि कारण हैं; जिनका शरीर श्याम वर्ण का है, जो आदिदेव और रोग-रहित (निरामय) हैं; जो अत्यंत पराक्रमी हैं और जिन्हें विचित्र तांडव नृत्य प्रिय है—उन काशी के स्वामी काल भैरव की मैं शरण लेता हूँ।
४. भोग और मोक्ष के दाता: भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम् । विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ४ ॥ अर्थ: जो अपने भक्तों को भुक्ति (सांसारिक सुख) और मुक्ति (मोक्ष) दोनों प्रदान करते हैं, जिनका विग्रह (शरीर) अत्यंत सुंदर है; जो भक्तों पर ममता रखने वाले हैं और जो समस्त लोकों में व्याप्त हैं; जिनकी कमर में बजने वाली स्वर्ण की घंटियाँ अत्यंत सुरीली और शोभायमान हैं—उन काशी के नाथ काल भैरव की मैं वंदना करता हूँ।
५. धर्म के रक्षक और कर्मों के बंधनों से मुक्ति: धर्मसेतुपालकं अधर्ममार्गनाशकं कर्मपाशमोचकं सुशर्मदायकं विभुम् । स्वर्णवर्णशेषपाशशोभिताङ्गमण्डलं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ५ ॥ अर्थ: जो धर्म के सेतु (पुल) की रक्षा करने वाले और अधर्म के मार्ग का नाश करने वाले हैं; जो हमें कर्मों के कठिन बंधनों से मुक्त करते हैं और सुख प्रदान करते हैं; जिनका शरीर स्वर्ण के समान कांति वाले शेषनाग के पाश से सुशोभित है—उन विभु काशी अधिपति काल भैरव को मैं भजता हूँ।
६. अद्वितीय और अविनाशी शिव पुत्र: रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरञ्जनम् । मृत्युदर्पनाशनं करादंष्ट्रमोक्षणं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ६ ॥ अर्थ: जिनके दोनों चरण रत्नों से जड़ित खड़ाऊँ (पादुका) की चमक से सुंदर दिखते हैं; जो नित्य, अद्वितीय, इष्टदेव और माया से रहित हैं; जो मृत्यु के अहंकार को नष्ट करने वाले हैं और यमराज के भय से मुक्ति दिलाने वाले हैं—उन काशी के स्वामी काल भैरव की मैं आराधना करता हूँ।
७. ब्रह्मांड के संहारक और पालक: अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसन्ततिं दृष्टिपातनष्टपापजालमुग्रशासनम् । अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ७ ॥ अर्थ: जिनके भीषण अट्टहास (हँसी) मात्र से ब्रह्मांड के अनेक अंडे विदीर्ण हो जाते हैं, जिनकी मात्र एक दृष्टि पड़ने से पापों का सारा जाल नष्ट हो जाता है और जिनका शासन अत्यंत उग्र है; जो आठों प्रकार की सिद्धियाँ देने वाले हैं और मुंडमाला धारण करते हैं—उन काशी के अधिपति काल भैरव को मैं भजता हूँ।
८. समस्त दुखों का अंत करने वाले: भूतसङ्घनायकं विशालकीर्तिदायकं काशिवासिलोकपुण्यपापशोधकं विभुम् । नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ८ ॥ अर्थ: जो समस्त भूत-प्रेतों के नायक हैं, जो विशाल कीर्ति (यश) प्रदान करने वाले हैं; जो काशी के निवासियों के पुण्य और पापों का शोधन (शुद्धि) करते हैं; जो नीति के मार्ग के ज्ञाता, पुरातन और जगत के पति हैं—उन काशी के अधिपति काल भैरव को मैं भजता हूँ।
फलश्रुति (Benefits of Reciting This Shri Kalabhairavashtakam):
कालभैरवाष्टकं पठन्ति ये मनोहरं ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम् । शोकमोहदैन्यलोभकोपतापनाशनं ते प्रयान्ति कालभैरवाङ्घ्रिसन्निधिं ध्रुवम् ॥
अर्थ: जो मनुष्य इस सुंदर और कल्याणकारी ‘कालभैरवाष्टकम’ का पाठ करते हैं, जो ज्ञान और मुक्ति का साधन है, जो पुण्यों को बढ़ाने वाला है और जो शोक, मोह, दरिद्रता, लोभ, क्रोध और संताप का नाश करता है; वे निश्चित रूप से भगवान काल भैरव के चरणों के सानिध्य को प्राप्त करते हैं।
श्री कालभैरवाष्टकम (Shri Kalabhairavashtakam) के १० चमत्कारी लाभ
- शत्रु बाधा से मुक्ति: यह स्तोत्र शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव को खत्म करने के लिए अचूक है।
- ग्रह दोष निवारण: शनि और राहु-केतु की पीड़ा को कम करने के लिए काल भैरव की पूजा अनिवार्य मानी गई है।
- समय प्रबंधन (Time Management): काल के स्वामी होने के कारण, इनका पाठ करने से व्यक्ति अपने समय का सही उपयोग करने लगता है।
- भय का नाश: अकाल मृत्यु, प्रेत बाधा और अज्ञात भय से मुक्ति मिलती है।
- पाप मुक्ति: श्लोक ८ के अनुसार, उनकी दृष्टि मात्र से पापों का जाल कट जाता है।
- मानसिक शक्ति: डिप्रेशन और मानसिक कमजोरी को दूर कर आत्मविश्वास बढ़ाता है।
- अष्ट सिद्धि: जो साधक साधना करते हैं, उन्हें सिद्धियाँ प्राप्त करने में मदद मिलती है।
- मुकदमों में जीत: कानूनी विवादों और कोर्ट कचहरी के मामलों में सफलता मिलती है।
- बुरी आदतों से छुटकारा: नशा, आलस्य और तामसिक प्रवृत्तियों को छोड़ने में सहायक है।
- काशी यात्रा का फल: काशी के कोतवाल की स्तुति से महादेव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
साधना और पाठ की विधि (Ritual) Shri Kalabhairavashtakam
- दिन: कालभैरवाष्टकम का पाठ रविवार या मंगलवार को करना विशेष फलदायी होता है। ‘भैरव अष्टमी’ इसका सबसे बड़ा दिन है।
- समय: रात्रि काल या संध्या काल में इसका पाठ अधिक प्रभावी होता है।
- दीपक: कड़वे तेल (सरसों के तेल) का दीपक जलाकर पाठ करें।
- भोग: काल भैरव को ‘इमरती’ या ‘उड़द की दाल के बड़े’ का भोग लगाया जाता है।
- वाहन की सेवा: भगवान भैरव का वाहन कुत्ता (Dog) है, इसलिए पाठ के बाद काले कुत्ते को रोटी खिलाना शुभ होता है।
FAQ (कालभैरवाष्टकम से जुड़े सवाल)
- Q: क्या महिलाएँ कालभैरवाष्टकम का पाठ कर सकती हैं?
- A: जी हाँ, भक्ति में कोई लिंग भेद नहीं है। महिलाएँ पूरी श्रद्धा के साथ पाठ कर सकती हैं।
- Q: क्या इसे घर में पढ़ना सुरक्षित है?
- A: बिल्कुल, यह एक सुरक्षा कवच है जो घर की नकारात्मकता को दूर करता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
Shri Kalabhairavashtakam भगवान शिव के उस रौद्र रूप की वंदना है जो बुराई का संहार कर धर्म की स्थापना करते हैं। यदि आप अपने जीवन में अनुशासन, सुरक्षा और मानसिक शांति चाहते हैं, तो इस अष्टक को अपनी दिनचर्या का हिस्सा जरूर बनाएं। theshivling.com पर हमारा प्रयास है कि हम महादेव के हर स्वरूप की महिमा आप तक पहुँचा सकें।
हर हर महादेव! जय काल भैरव!

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