श्री शिव अपराध क्षमापन स्तोत्रम् (Shiva Aparadha Kshamapana Stotram): भूल-चूक की माफी के लिए महादेव की पुकार
मनुष्य गलतियों का पुतला है। हम अपने दैनिक जीवन में, चाहे अनजाने में हो या जानबूझकर, कई ऐसे कार्य करते हैं जो शास्त्र विरुद्ध होते हैं या जिनसे किसी का हृदय दुखता है। आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए ‘क्षमा’ सबसे आवश्यक तत्व है। Shiva Aparadha Kshamapana Stotram आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित एक ऐसा अद्भुत स्तोत्र है, जिसमें एक भक्त महादेव के सामने अपना हृदय खोलकर रख देता है और अपने बचपन से लेकर बुढ़ापे तक के सभी अपराधों की क्षमा मांगता है।
आज theshivling.com की “108 शिव स्तोत्र श्रृंखला” के पांचवें अध्याय में, हम Shiva Aparadha Kshamapana Stotram के गहरे अर्थ, इसके प्रभाव और इसके संपूर्ण पाठ के बारे में विस्तार से जानेंगे।
Shiva Aparadha Kshamapana Stotram का आध्यात्मिक महत्व

Shiva Aparadha Kshamapana Stotram आत्म-निरीक्षण (Self-Reflection) का सबसे बड़ा माध्यम है। इसमें शंकराचार्य जी ने केवल पूजा-पाठ की गलतियों की बात नहीं की है, बल्कि जीवन के हर पड़ाव—बचपन की नादानी, जवानी का अहंकार और बुढ़ापे की लाचारी—में होने वाले मानसिक और शारीरिक अपराधों का वर्णन किया है।
जब हम Shiva Aparadha Kshamapana Stotram का पाठ करते हैं, तो हम स्वीकार करते हैं कि हम पूर्ण नहीं हैं। महादेव ‘भोलेनाथ’ हैं, वे दया के सागर हैं। यदि कोई भक्त सच्चे हृदय से इस स्तोत्र के माध्यम से उनसे क्षमा मांगता है, तो वे उसके सभी पापों का शमन कर उसे शांति प्रदान करते हैं।
॥ श्री शिव अपराध क्षमापन स्तोत्रम् (Shiva Aparadha Kshamapana Stotram) – संपूर्ण १७ श्लोक अर्थ सहित ॥
१. गर्भवास के कष्टों की क्षमा: आदौ कर्मप्रसङ्गात्कलयति कलुषं मातृकुक्षौ स्थितं मां । विण्मूत्रामध्ये विष्ठा विगलितवपुषं दाहमानं शिखिभिः । यद्यद्वै तत्र दुःखं व्यथयति सततं शक्यते केन वक्तुं । क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥ १ ॥ अर्थ: हे महादेव! पूर्वजन्म के कर्मों के कारण मैंने माता के गर्भ में मल-मूत्र के बीच जो कष्ट सहे और वहाँ जो भी मानसिक संताप झेले, उन सभी अपराधों के लिए मुझे क्षमा करें।
२. बाल्यकाल की अज्ञानता: बाल्ये दुःखातिरेको मललुलितवपुः स्तन्यपाने पिपासा । नो शक्तश्चेन्द्रियेभ्यो भवगुणजनिताः जन्तवो मां तुदन्ति । नानारोगातिदुःखाद्रुदनपरवशः शङ्करं न स्मरामि । क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥ २ ॥ अर्थ: बचपन में भूख-प्यास, बीमारियों और इंद्रियों की अक्षमता के कारण मैं केवल रोता रहा और आपका स्मरण नहीं कर पाया। हे शम्भो! मेरी उस नादानी को क्षमा करें।
३. युवावस्था का अहंकार: प्रौढोऽहं यौवनस्थो विषयविषधरैः पञ्चभिर्मर्मसन्धौ । दष्टो नष्टो विवेकः सुतधनयुवतिस्वादुसौख्ये निषण्णः । शैवीचिन्ताविहीनं मम हृदयमहो मानगर्वाधिरूढं । क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥ ३ ॥ अर्थ: जवानी में काम, क्रोध, लोभ, मोह और मत्सर रूपी सांपों ने मुझे डस लिया। मेरा विवेक नष्ट हो गया और मैं सांसारिक सुखों में डूबकर आपको भूल गया। मेरे इस गर्व और अहंकार को क्षमा करें।
४. वृद्धावस्था की लाचारी: वार्धक्ये चेन्द्रियाणां विकलगतिमतश्चाधिदैवादितापैः । पापैः रोगैर्वियोगैस्त्वनवसितवपुः प्रौढिहीनं च दीनम् । मिथ्यामोहप्रपञ्चैर्भ्रमति मम मनो धूर्जटेर्ध्यानशून्यं । क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥ ४ ॥ अर्थ: बुढ़ापे में जब इंद्रियां शिथिल हो गईं और शरीर रोगों से घिर गया, तब भी मेरा मन माया-मोह में ही भटकता रहा और आपका ध्यान नहीं कर सका। हे महादेव! मुझे क्षमा करें।
५. पूजा की विधियों में कमी: नो शक्यं स्मार्तकर्म प्रतिपदगहनं प्रत्यवायाकुलाख्यं । श्रौतं केनापि मार्गं मृदुपदगहनं वेदमार्गं न जाने । न ज्ञातोऽहं विचारं श्रुतिगणगहनं धर्मे मन्दप्रचारं । क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥ ५ ॥ अर्थ: न मैं वेदों को जानता हूँ, न शास्त्रों को। मैंने कभी सही ढंग से धर्म का पालन नहीं किया। मेरी इस अज्ञानता को क्षमा करें।
६. तीर्थ और दान की उपेक्षा: ध्यातो नासौ गङ्गासागरममलं ब्रह्मतीर्थं न गत्वा । नो सङ्कल्पं न दानं न च नियमयुतं शैवपूजाविधिं वै । नो जप्तं मन्त्रमुच्चैः कथमपि न कृतं भक्तिभावं सदा वै । क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥ ६ ॥ अर्थ: मैंने न गंगा-सागर की यात्रा की, न दान-पुण्य किया और न ही कभी नियम से आपकी पूजा की। मेरी इस श्रद्धाहीनता को क्षमा करें।
७. ध्यान का अभाव: ध्यात्वा चित्ते शिवेति प्रचुरतरफलं नैव लब्धं मया वै । नो दृष्टं लिङ्गमर्चं कथमपि न कृतं भक्तिभावेन पूजा । स्वप्नेऽप्यज्ञानवशं कथमपि न कृतं नामसङ्कीर्तनं वै । क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥ ७ ॥
८. ध्यान की एकाग्रता न होना: स्थित्वा स्थाने शिवेति प्रचुरतरफलं नैव लब्धं मया वै । यत्पूर्वं जन्ममध्ये कथमपि न कृतं शम्भुसेवां सदा वै । तस्मात्पापापराधं क्षमस्व गिरिश भो श्रीमहादेव शम्भो ॥ ८ ॥
९. पूजा सामग्री की कमी: नो पूजा गन्धपुष्पैर्न च विविधफलैर्दीपनैवेद्यधूपैः । नो दत्ता दक्षिणा वै कथमपि न कृता सर्वमङ्गल्यपूजा । क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥ ९ ॥
१०. पंचाक्षरी मंत्र का जाप न करना: स्थित्वा मौने न जप्तं कथमपि न कृतं नामपञ्चाक्षरी वै । नो ध्यानं लिङ्गमर्चं कथमपि न कृतं सर्वपापप्रणाशम् । क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥ १० ॥
११. प्रदोष और शिवरात्रि की अवहेलना: नो दत्तं बिल्वपत्रं कथमपि न कृतं सर्वपापप्रणाशम् । नो दृष्टं लिङ्गमर्चं कथमपि न कृतं भक्तिभावेन पूजा । क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥ ११ ॥
१२. शरीर द्वारा किए गए अपराध: स्थित्वा स्थाने सुखेऽपि कथमपि न कृतं सर्वमङ्गल्यपूजा । नो भक्त्या चिन्तितं मे कथमपि न कृतं सर्वपापप्रणाशम् । क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥ १२ ॥
१३. मानसिक अपराध: मानं वा मानसं वा कथमपि न कृतं सर्वमङ्गल्यपूजा । क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥ १३ ॥
१४. ज्ञात-अज्ञात पापों का क्षमापन: करचरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा । श्रवणनयनजं वा मानसं वाऽपराधम् । विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व । जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो ॥ १४ ॥ अर्थ: हाथ, पैर, वाणी, शरीर, कान, आँख या मन से जो भी ज्ञात-अज्ञात अपराध हुए हों, हे करुणा के सागर महादेव! उन्हें क्षमा करें।
१५. अंत समय की प्रार्थना: ध्यानं चित्तविशुद्धिदं सुविमलं यत्सौख्यदं शाश्वतं । यत्प्राप्तं शिवनाममन्त्रमनिशं यत्सर्वसौख्यप्रदम् । क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥ १५ ॥
१६. शिव सायुज्य की इच्छा: स्थित्वा शिवेति हृदये न च भक्तिभावं । तस्मात्पापमपराधं क्षमस्व शम्भो ॥ १६ ॥
१७. फलश्रुति: इति शिवपराधक्षमापणस्तोत्रं संपूर्णम् । यः पठेच्छिवसंनिधौ स भुक्त्वा सकलान् कामान् शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ १७ ॥
१० अद्भुत लाभ: Shiva Aparadha Kshamapana Stotram क्यों पढ़ें?
- भारी मन का हल्का होना: जब हम अपनी गलतियाँ स्वीकार कर लेते हैं, तो मानसिक तनाव कम हो जाता है।
- आत्म-साक्षात्कार: यह स्तोत्र हमें अपनी गलतियों को पहचानने की शक्ति देता है।
- अनजाने पापों का नाश: दिनभर में पैरों के नीचे आने वाले कीड़े-मकोड़ों जैसे पापों की क्षमा मिलती है।
- वाणी की शुद्धि: इसके उच्चारण से कटु शब्द बोलने की आदत कम होती है।
- दुर्घटनाओं से बचाव: महादेव की कृपा से अकाल संकट टल जाते हैं।
- पारिवारिक सुख: घर के कलह शांत होते हैं।
- आध्यात्मिक उन्नति: क्षमा मांगने से ही भक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
- बुराइयों से दूरी: यह स्तोत्र हमें भविष्य में गलतियां न करने की प्रेरणा देता है।
- भय का अंत: मृत्यु और यमराज का भय समाप्त होता है।
- महादेव का सानिध्य: जो क्षमा मांगता है, महादेव उसे अपने गणों में स्थान देते हैं।
श्री शिव अपराध क्षमापन स्तोत्रम् (Shiva Aparadha Kshamapana Stotram): पश्चाताप की अग्नि से आत्मा की शुद्धि
सनातन परंपरा में ‘अपराध’ केवल वही नहीं है जो हम कानून की नजर में करते हैं, बल्कि वे सूक्ष्म गलतियां भी हैं जो हमारे मन, वाणी और कर्मों द्वारा अनजाने में हो जाती हैं। आदि गुरु शंकराचार्य जी ने मनुष्य की इन्हीं कमजोरियों को समझा और महादेव के चरणों में Shiva Aparadha Kshamapana Stotram के रूप में एक ऐसी अर्जी लगाई, जो किसी भी भक्त के हृदय को निर्मल कर सकती है।
आज theshivling.com की “108 शिव स्तोत्र श्रृंखला” के पांचवें अध्याय में, हम Shiva Aparadha Kshamapana Stotram के सभी १७ श्लोकों का पाठ करेंगे और समझेंगे कि कैसे हम अपने जीवन के हर पड़ाव—गर्भावस्था से लेकर मृत्यु तक—के पापों के लिए भोलेनाथ से क्षमा मांग सकते हैं।
॥ श्री शिव अपराध क्षमापन स्तोत्रम् (Shiva Aparadha Kshamapana Stotram) – मूल संस्कृत पाठ ॥
श्री शिव अपराध क्षमापन स्तोत्र हिंदी अर्थ यहाँ इस स्तोत्र के सभी मुख्य श्लोक अर्थ सहित दिए गए हैं:
आदौ कर्मप्रसङ्गात्कलयति कलुषं मातृकुक्षौ स्थितं मां । विण्मूत्रामध्ये विष्ठा विगलितवपुषं दाहमानं शिखिभिः । यद्यद्वै तत्र दुःखं व्यथयति सततं शक्यते केन वक्तुं । क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥ १ ॥ (अर्थ: हे महादेव! माता के गर्भ में मल-मूत्र के बीच स्थित होकर मैंने जो कष्ट सहे और जो अपराध किए, उनके लिए मुझे क्षमा करें। हे शम्भो! मेरे अपराधों को क्षमा करें।)
बाल्ये दुःखातिरेको मललुलितवपुः स्तन्यपाने पिपासा । नो शक्तश्चेन्द्रियेभ्यो भवगुणजनिताः जन्तवो मां तुदन्ति । नानारोगातिदुःखाद्रुदनपरवशः शङ्करं न स्मरामि । क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥ २ ॥
प्रौढोऽहं यौवनस्थो विषयविषधरैः पञ्चभिर्मर्मसन्धौ । दष्टो नष्टो विवेकः सुतधनयुवतिस्वादुसौख्ये निषण्णः । शैवीचिन्ताविहीनं मम हृदयमहो मानगर्वाधिरूढं । क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥ ३ ॥ (अर्थ: जवानी के जोश में पाँचों इन्द्रियों रूपी सांपों ने मुझे डस लिया, मेरा विवेक नष्ट हो गया और मैं धन-स्त्री के सुख में डूब गया। मैंने कभी आपका ध्यान नहीं किया, मेरे इस अहंकार को क्षमा करें।)
(इसी प्रकार अन्य श्लोकों में बुढ़ापे की असमर्थता, पूजा में हुई कमियों और दान-पुण्य न कर पाने का वर्णन है…)
करचरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा । श्रवणनयनजं वा मानसं वाऽपराधम् । विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व । जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो ॥ (यह इस स्तोत्र का सबसे प्रसिद्ध मंत्र है: हाथ, पैर, वाणी, शरीर, कान, आँख या मन से जो भी ज्ञात-अज्ञात अपराध हुए हों, हे करुणा के सागर महादेव! उन्हें क्षमा करें।)
अद्भुत लाभ: Shiva Aparadha Kshamapana Stotram क्यों पढ़ें?
पूजा की पूर्णता: अक्सर पूजा के अंत में इसे पढ़ा जाता है ताकि पूजा में हुई किसी भी कमी को महादेव क्षमा कर दें।
मानसिक शांति (Peace of Mind): अपराध बोध (Guilt) इंसान को अंदर ही अंदर खाता है। इस स्तोत्र Shiva Aparadha Kshamapana Stotram का पाठ करने से मन का बोझ हल्का होता है।
पाप मुक्ति: अनजाने में हुई हत्या (जैसे पैरों के नीचे चींटी का आना) या किसी का दिल दुखाने जैसे पापों का प्रायश्चित होता है।
अहंकार का नाश: यह स्तोत्र Shiva Aparadha Kshamapana Stotram हमें याद दिलाता है कि हम ईश्वर के सामने कितने छोटे हैं, जिससे विनम्रता आती है।
निष्कर्ष (Conclusion)
Shiva Aparadha Kshamapana Stotram केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि महादेव के प्रति हमारी आत्मा की पुकार है। आदि गुरु शंकराचार्य जी ने हमें सिखाया कि महादेव से कुछ छिपाना व्यर्थ है, उनके सामने सरल बन कर अपनी गलतियां स्वीकार कर लेना ही सबसे बड़ी भक्ति है। theshivling.com की इस 108 स्तोत्र श्रृंखला के साथ जुड़कर अपने जीवन को धन्य बनाएं।
हर हर महादेव!

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