लिंगाष्टकम (Lingashtakam)
लिंगाष्टकम (Lingashtakam) का आध्यात्मिक महत्व शिव पुराण के अनुसार, शिवलिंग की पूजा करने से भक्त को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। Lingashtakam में शिवलिंग के विभिन्न गुणों का वर्णन किया गया है। यह स्तोत्र हमें बताता है कि शिवलिंग केवल पत्थर नहीं, बल्कि वह परम ब्रह्म है जिसे ऋषि-मुनि, देवता और स्वयं भगवान विष्णु और ब्रह्मा भी पूजते हैं। जो भक्त प्रतिदिन लिंगाष्टकम (Lingashtakam) का पाठ करता है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर महादेव के सायुज्य को प्राप्त करता है।

सनातन धर्म में भगवान शिव के निराकार स्वरूप यानी ‘शिवलिंग’ की पूजा का विशेष महत्व है। शिवलिंग साक्षात ब्रह्मांड का प्रतीक है, और इस दिव्य स्वरूप की सबसे सुंदर स्तुति लिंगाष्टकम (Lingashtakam) कहलाती है। ‘अष्टकम’ का अर्थ है आठ श्लोकों वाला स्तोत्र। आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित यह स्तोत्र न केवल सुनने में मधुर है, बल्कि इसके उच्चारण मात्र से मन में अपार शांति का संचार होता है। आज theshivling.com की “108 शिव स्तोत्र श्रृंखला” के चौथे अध्याय में, हम लिंगाष्टकम (Lingashtakam) के हर श्लोक और उसके गहरे अर्थ को समझेंगे।
भक्तों की शुद्धता के लिए यहाँ लिङ्गाष्टकम् का संपूर्ण पाठ दिया जा रहा है:
ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं निर्मलभासितशोभितलिङ्गम् ।
जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥१॥
देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गं कामदहं करुणाकरलिङ्गम् ।
रावणदर्पविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥२॥
सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गं बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम् ।
सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥३॥
कनकमहामणिभूषितलिङ्गं फणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गम् ।
दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥४॥
कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गं पङ्कजहारसुशोभितलिङ्गम् ।
सञ्चितपापविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥५॥
देवगणार्चितसेवितलिङ्गं भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम् ।
दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥६॥
अष्टदलोपरिवेष्टितलिङ्गं सर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम् ।
अष्टदरिद्रविनाशितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥७॥
सुरगुरुसुरवरपूजितलिङ्गं सुरवनपुष्पसदार्चितलिङ्गम् ।
परात्परं परमात्मकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥८॥
लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥
लिंगाष्टकम (Lingashtakam) का आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व
शिव पुराण और लिंग पुराण में वर्णन मिलता है कि भगवान शिव का लिंग स्वरूप अनंत ऊर्जा का स्रोत है। जब सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा जी और विष्णु जी के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ, तब एक विशाल अग्नि स्तंभ प्रकट हुआ, जिसका न कोई आदि था और न अंत। वही ‘शिवलिंग’ था।
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