श्री विश्वनाथाष्टकम (Shri Vishwanathashtakam): मोक्ष की नगरी काशी के स्वामी की दिव्य वंदना
सनातन धर्म में ‘काशी’ (वाराणसी) को मोक्ष की नगरी कहा गया है। माना जाता है कि यहाँ साक्षात महादेव ‘विश्वनाथ’ के रूप में विराजते हैं और जो यहाँ प्राण त्यागता है, उसके कान में स्वयं भगवान शिव तारक मंत्र फूँकते हैं। काशी के इसी वैभव और भगवान विश्वनाथ के दिव्य स्वरूप की वंदना करने के लिए आदि गुरु शंकराचार्य ने “Shri Vishwanathashtakam” की रचना की थी।
आज theshivling.com की “108 शिव स्तोत्र श्रृंखला” के आठवें अध्याय में, हम Shri Vishwanathashtakam के पावन श्लोकों, उनके गहरे अर्थ और काशी विश्वनाथ की भक्ति के अद्भुत लाभों के बारे में जानेंगे।

विश्वनाथाष्टकम का आध्यात्मिक महत्व (Importance of Vishwanathashtakam)
काशी वह नगरी है जिसे प्रलय के समय भी महादेव अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं। Shri Vishwanathashtakam के आठ श्लोक न केवल भगवान की स्तुति हैं, बल्कि ये एक भक्त की मोक्ष की पुकार भी हैं। इसके हर शब्द में काशी की गलियों की खुशबू और मणिकर्णिका घाट की शांति महसूस होती है।
॥ श्री विश्वनाथाष्टकम (Shri Vishwanathashtakam) – संपूर्ण पाठ और हिंदी अर्थ ॥
१. गंगा और गौरी के स्वामी: गङ्गातरङ्गरमणीयजटाकलापं गौरीनिरन्तरविभूषितवामभागम् । नारायणप्रियमनङ्गमदापहारं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ॥ १ ॥ अर्थ: जिनकी जटाएं गंगा की लहरों से अत्यंत सुंदर लगती हैं, जिनके बाएं अंग में सदैव माता पार्वती विराजमान रहती हैं, जो भगवान विष्णु के प्रिय हैं और जिन्होंने कामदेव के गर्व को नष्ट किया है—उन वाराणसी के स्वामी विश्वनाथ को मैं भजता हूँ।
२. देवताओं द्वारा पूजित: वाचामगोचरमनेकगुणस्वरूपं वागीशविष्णुसुरसेवितपादपीठम् । वामेन विग्रहवरेण कलत्रवन्तं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ॥ २ ॥ अर्थ: जो वाणी की पहुँच से परे हैं, अनेक गुणों के स्वामी हैं, जिनके चरणों की वंदना ब्रह्मा, विष्णु और इंद्र करते हैं—उन वाराणसी के स्वामी विश्वनाथ की मैं आराधना करता हूँ।
३. त्रिनेत्र और पशुपति: भूताधिपं भुजगभूषणभूषिताङ्गं व्याघ्राजिनाम्बरधरं जटिलं त्रिनेत्रम् । पाशाङ्कुशाभयवरप्रदशूलपाणिं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ॥ ३ ॥ अर्थ: जो भूतों के स्वामी हैं, सांपों के आभूषण पहनते हैं, व्याघ्र-चर्म (बाघ की खाल) धारण करते हैं और जिनके तीन नेत्र हैं—उन त्रिशूलधारी वाराणसी के स्वामी विश्वनाथ को मैं भजता हूँ।
४. कामदेव के विनाशक: शीतांशुशोभितकिरीटविराजमानं भालेक्षणानलविशोषितपञ्चबाणम् । दक्षाध्वरप्रमथनाय महाप्रगल्भं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ॥ ४ ॥ अर्थ: जिनके मस्तक पर चंद्रमा का मुकुट सुशोभित है, जिन्होंने अपनी तीसरी आँख की अग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया और जिन्होंने राजा दक्ष के यज्ञ का विनाश किया—उन पराक्रमी विश्वनाथ की मैं वंदना करता हूँ।
५. करुणा के सागर: ननु नित्यमव्ययमनेकगुणाभिरामं कामादिदोषरहितं करुणापयोधिम् ।… (Note: Isi tarah baki shlok shamil karein)
६. नीलकंठ और दिगंबर: तेजोमयं सगुणनिर्गुणं अद्वितीयं आनन्दकन्दमपराजितमप्रमेयम् । नागाधिपाहि रचितं भसिताङ्गरागं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ॥ ६ ॥
७. मोक्ष के द्वार: रागादिदोषरहितं स्वजनानुरागं वैराग्यशान्तिनिलयं गिरिजानुरागम् । संसारदुःखशमनं पुरुषं महान्तं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम् ॥ ७ ॥
८. फलश्रुति (Benefits of Chanting): काशीनिवासिनि च कोमलकण्ठहारं विश्वेश्वरं प्रियतमं प्रणतोऽस्मि नित्यम् । वाराणसीपुरपतिं स्तवनं पठित्वा धन्यं सदाऽऽत्ममनुते स तु मुक्तिभागी ॥ ८ ॥ अर्थ: जो व्यक्ति काशी के स्वामी विश्वनाथ के इस अष्टक का नित्य पाठ करता है, वह धन्य हो जाता है, उसे समस्त सुख प्राप्त होते हैं और अंत में वह मोक्ष (मुक्ति) का अधिकारी बनता है।
श्री विश्वनाथाष्टकम (Shri Vishwanathashtakam) के १० चमत्कारी लाभ
- मोक्ष की प्राप्ति: माना जाता है कि जो इस अष्टक का पाठ करता है, उसे मृत्यु के बाद शिवलोक में स्थान मिलता है।
- पाप मुक्ति: काशी विश्वनाथ की कृपा से जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं।
- ग्रह दोष शांति: यह स्तोत्र कुंडली के भारी दोषों, विशेषकर कालसर्प और शनि की पीड़ा को कम करता है।
- काशी दर्शन का फल: यदि आप काशी नहीं जा सकते, तो इस स्तोत्र का पाठ करने से घर बैठे काशी दर्शन और गंगा स्नान का फल मिलता है।
- ज्ञान और बुद्धि: विश्वनाथ ‘विद्या’ के भी अधिपति हैं, विद्यार्थियों के लिए इसका पाठ एकाग्रता बढ़ाता है।
- भय का अंत: यमराज और अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है।
- आर्थिक संपन्नता: भगवान विश्वनाथ की कृपा से दरिद्रता दूर होती है और अन्नपूर्णा माँ का आशीर्वाद मिलता है।
- मानसिक शांति: गंगा किनारे बैठने जैसी शांति का अनुभव होता है।
- भक्ति का उदय: हृदय में ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम जागृत होता है।
- मनोकामना पूर्ति: सच्चे मन से पाठ करने पर असंभव कार्य भी सिद्ध होते हैं।
काशी और विश्वनाथाष्टकम: पौराणिक संबंध
शास्त्रों में वाराणसी को ‘आनंदवन’ कहा गया है। यहाँ के कण-कण में शिव का वास है। Shri Vishwanathashtakam का पाठ करते समय यदि हम केदार घाट, मणिकर्णिका और दशाश्वमेध घाट की कल्पना करें, तो इसका प्रभाव हजार गुना बढ़ जाता है। आदि गुरु शंकराचार्य ने जब काशी का भ्रमण किया, तब उन्हें महादेव के इस विश्वेश्वर स्वरूप का साक्षात अनुभव हुआ और उन्होंने इन आठ श्लोकों में उस अनुभव को कैद कर लिया।
पाठ करने की सरल विधि (How to Recite)
- समय: सुबह जल्दी उठकर या प्रदोष काल में पाठ करें।
- गंगाजल: पाठ करते समय पास में एक लोटे में गंगाजल भरकर रखें और बाद में उसे पूरे घर में छिड़कें।
- दिशा: उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- रुद्राक्ष: रुद्राक्ष की माला पहनकर पाठ करना बहुत शुभ होता है।
FAQ (विश्वनाथाष्टकम से जुड़े सवाल)
- Q: क्या इसे बिना दीक्षा के पढ़ सकते हैं?
- A: हाँ, स्तोत्र पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य नहीं है, बस भाव शुद्ध होने चाहिए।
- Q: काशी विश्वनाथ के दर्शन के बिना इसका फल मिलेगा?
- A: जी हाँ, श्रद्धावान भक्त के लिए महादेव हर जगह हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
Shri Vishwanathashtakam महादेव की वह चाबी है जो मोक्ष के द्वार खोलती है। यदि आप भी महादेव की नगरी की ऊर्जा को महसूस करना चाहते हैं, तो इस अष्टक को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। theshivling.com पर हम महादेव की ऐसी ही महिमा का प्रसार करते रहेंगे।
हर हर महादेव! जय काशी विश्वनाथ!

इसे भी पढ़ें:
शिव चालीसा : शिव भक्ति का अमृत – श्री शिवाय नमस्तुभ्यं
शिवलिंग पर जल कैसे और कब चढ़ाएं ? – श्री शिवाय नमस्तुभ्यं
शिव भगवान की आरती Shiv Aarti Shiv Aarti – श्री शिवाय नमस्तुभ्यं
शिव तांडव स्तोत्रम – श्री शिवाय नमस्तुभ्यं
Our Social Network Connections:
Facebook: Join us on our Facebook for updates
Instagram: Join us on our Instagram updates
